स्वतंत्रता सेनानी: 5 महानायक जिन्होंने आजादी दिलाने में निभाई मुख्य भूमिका

हमारे देश की स्वतंत्रता के लिए कुछ ही नहीं, बल्कि लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी हैं, मगर कुछ ऐसे भी लोग थे जो एक नई प्रतीक के साथ उभरे है। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के लिए जीवन, परिवार, संबंध और भावनाओं से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था हमारे देश की आजादी…

इस पूरी लड़ाई में काई व्यक्तित्व उभरे, कई घटनाएं हुई, इस अद्भुत क्रांति में असंख्य लोग मारे गए, घायल हुए आदि।आइए जानते है ऐसे महानायकों के बारे में जिन्होंने आजादी दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई थी।

  • मंगल पांडे

मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई, साल 1827 में बलिया के यूपी में हुआ था। ये बलिया के एक गांव नगवा में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडे और माता का नाम अभय रानी था। वे सन 1849 में 22 साल की उम्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए थे।

वे बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की पैदल सेना में एक सिपाही थे। यहीं पर गाय और सूअर की चर्बी वाले राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ था। जिससे सैनिकों में आक्रोश बढ़ गया और परिणाम स्वरुप 9 फरवरी 1857 को नया कारतूस को मंगल पांडेय ने इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया। 29 मार्च सन् 1857 को अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन भगत सिंह से उनकी राइफल छीनने लगे और तभी उन्होंने ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया।

साथ ही अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेन्ट बॉब को भी मार डाला था। इस कारण उनको 8 अप्रैल, 1857 को फांसी पर लटका दिया गया था।

  • भगत सिंह

शहीद भगत सिंह पंजाब के रहने वाले थे। उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। भगत सिंह मात्र 23 साल के थे जब उन्होंने अपने देश के लिए फांसी को गले लगाया था। भगत सिंह पर अराजकतावादी और मार्क्सवादी विचारधाराओं का काफी प्रभाव पड़ा था।

लाला लाजपत राय की मौत ने उनको अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए उत्तेजित किया था। उन्होंने इसका बदला ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉंडर्स की हत्या करके लिया। भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय विधान सभा या फिर असेंबली में बम फेंकते हुए क्रांतिकारी नारे लगाए थे। उन पर लाहौर षड़यंत्र का मुकदमा चला और 23 मार्च, 1931 की रात भगत सिंह को फांसी पर लटका दिया गया था।

  • महात्मा गांधी

महात्मा गांधी को राष्ट्रीय पिता और बापू कह कर भी बुलाया जाता है। उनके पिता का नाम करमचंद्र गाँधी और माता का नाम पुतलीबाई था। महात्मा गांधी को भारत के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ कुछ लोगों में से एक माना जाता है जिन्होंने दुनिया को बदल दिया।

उन्होंने सरल जीवन और उच्च सोच जैसे मूल्यों का प्रचार किया। उनके सिद्धांत थे सच्चाई, अहिंसा और राष्ट्रवाद। गांधी ने सत्याग्रह का नेतृत्व किया, हिंसा के खिलाफ आंदोलन, जिसने अंततः भारत की आजादी की नींव रखी। उनके जीवनभर की गतिविधियों में किसानों, मजदूरों के खिलाफ भूमि कर और भेदभाव का विरोध करना शामिल हैं। वे अपने जीवन के अंत तक अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ते रहे। 30 जनवरी, 1948 को नई दिल्ली में नाथुरम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी।

  • पंडित जवाहरलाल नेहरू

पंडित जवाहरलाल नेहरू को चाचा नेहरू और पंडित जी के नाम से भी बुलाया जाता है। उनके पिता का नाम पं. मोतीलाल नेहरू और माता का नाम श्रीमती स्वरूप रानी था। वह भारतीय स्वतंत्रता के लिए महात्मा गांधी के साथ सम्पूर्ण ताकत से लड़े, असहयोग आंदोलन का हिस्सा रहे।

असल में वह एक बैरिस्टर और भारतीय राजनीति में एक केंद्रित व्यक्ति थे। आगे चलकर वे राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। बाद में वह उसी दृढ़ विश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधीजी के साथ जुड़ गए। भारतीय स्वतंत्रता के लिए 35 साल तक लड़ाई लड़ी और तकरीबन 9 साल जेल भी गए। 15 अगस्त, 1947 से 27 मई, 1964 तक पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने थे। उन्हें आधुनिक भारत के वास्तुकार के नाम से भी जाना जाता है।

  • चंद्रशेखर आजाद

इनका पूरा नाम पंडित चंद्रशेखर तिवारी था और उन्हें आजाद कहकर भी बुलाया जाता था। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम जाग्रानी देवी था। वे 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। वहीं पर उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान भी दिया था।

वे एक महान भारतीय क्रन्तिकारी थे। उनकी उग्र देशभक्ति और साहस ने उनकी पीढ़ी के लोगों को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। साल 1920-21 में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े, भारतीय क्रंतिकारी, काकोरी ट्रेन डकैती (1926), वाइसराय की ट्रैन को उड़ाने का प्रयास (1926), लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सॉन्डर्स पर गोलीबारी की (1928), भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्रसभा का गठन भी किया था।

जब वे जेल गए थे वहां पर उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को उनका निवास बताया था। उनकी मृत्यु 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में हुई थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.